Tuesday, August 31, 2010

शेर ने छलांग लगाई और......

वीरान जगह पर हंसते खेलते परिवार का बसेरा था...रोज की तरह ही 11 साल की विमुखी और 12  साल के वैभव साथ में खेल रहे थे... ''
''माँ आइये ना आप भी हमारे साथ खेलिए!!'' विमुखी ने किचन में खाना बनो रही माँ से कहा.
''तुम लोग खेलो बेटा...मैं खाना बना लूँ... शाम के सात बजने वाले हैं, तुम्हारे पापा आते ही होंगे. वो आ जायें फिर सब साथ में खेलेंगे.. ओके??
''ओके माँ आई विल वेट फॉर यू..''
''येस बेबी...मैं पक्का आउंगी''
उसके बाद विमुखी और वैभव छिपन-छिपाई खेलने लगे..

''माँ, पापा अभी तक नहीं आये ?? '' वैभव ने हाँथ पैर धोकर पुछा.
''नहीं बेटा पता नहीं क्या हुआ अभी तक कोई फ़ोन भी नहीं किया, तू जरा उनको फ़ोन कर के देख !!''
''दि नंबर यू आर ट्राइंग टू कॉल इज नॉट रीचेबल...''
''माँ पापा का फ़ोन मिल नहीं रहा...''
''चलो कोई बात नहीं, मैं थोड़ी देर में फिर से मिला लूंगी..विमुखी कहाँ है! उससे कहो अपना होम वर्क कर ले.. ''
''माँ वो बैग ले कर रूम में ही पढने गई है...''
आधे घंटे बाद ही पापा आ गए..
''कहाँ रह गए थे आप..आपका फ़ोन भी नहीं मिल रहा था...इज एवरीथिंग फाइन??'' अवंतिका ने अविनाश से पुछा
''कुछ नहीं.. एक खबर मिली थी कि इस इलाके में दो शेर घुस आएं हैं...ऑफिस में जब सूचना मिली तो सबको गाड़ी से भिजवाया गया...इसलिए थोड़ी देर हो गई...''
''शेर...??''
''हाँ!! पास के जंगलों से यहाँ आ गए हैं...फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट के लोग ढूंढ रहे हैं...मिलते ही पकड़ कर उनके क्षेत्र में छोड़ आयेंगे..''
''पर...''
''तुम परेशान मत हो... सब कुछ ठीक है...''
''पर कुछ हो गया तो... जानवरों का क्या भरोसा?? यहाँ पर ज्यादा आबादी भी नहीं है...''
''ओ कम ऑन अवंतिका अगर तुम भी डर गई तो कैसे काम चलेगा?? अच्छा सुनो बच्चों को कुछ मत बताना. वो डर जायेंगे..''
''ओके!!''
'' विमुखी...वैभव.... कहाँ हो सब भाई... आज मेरे साथ खेलना नहीं है क्या?? अविनाश ने बच्चों को आवाज़ लगाई तो दोनों भाग कर उसके पास आ गए.
''पापा आज आपको इतनी देर कैसे हो गई...'' दोनों ने एकसाथ पुछा
'' कुछ नहीं बेटा...ऑफिस में थोड़ा काम आ गया था...दोनों ने पढ़ाई कर ली??''
''येस..'' दोनों फिर से साथ में बोले
''ओके..तो चलो हो जाये पिल्लो फाईट??''

''नो नो अवि..पिल्लो फाईट नहीं..पूरा बिस्तर ख़राब हो जाता है.. ''
''ओके तो फिर छिपन छिपाई कौन खेलेगा??'' अविनाश ने विमुखी को गुदगुदी मचाते हुए पुछा
''हम दोनों खेलेंगे...ये...'' वैभव जोर से चिल्लाया
''ओके पहले मैं छिपऊँगा.. बारी-बारी से तुम लोग..ओके??
''ओके...'' विमुखी का ये वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था की लाइट चली गई...
''ओ नो....'' सब एक साथ और एक स्वर में बोले...
''अब क्या करें??''
''कुछ नहीं बाहर जाकर खेलते हैं.. '' वैभव बोला
''नो नो बाहर नहीं..तुम लोग जानते नहीं हो... इतनी रात है कुछ हो गया तो...चलो नॉव.. खाना खा के सो जाओ..'' अवंतिका ने कहा
''पर माँ प्लीज़...मुझे पापा के साथ खेलना है..''
''ओके ओके इस बात पर कोई बहस नहीं करेगा...मेरे पास एक तरकीब है.. जिससे हम खेल भी सकेंगे और बच्चों का दिल भी नहीं टूटेगा!!'' अविनाश ने कहा
''हम बाहर जायेंगे..लेकिन केवल अन्ताक्षरी ही खेलेंगे ओके?? ''
''ओके''
चार कुर्सियां सज गईं.. सब घर के दरवाजे के पास ही.
''पर मुझे पानी पीना है...'' विमुखी ने कहा
''अरे यार.. तुमको तो मेन टाइम पर ही ये सब क्यूँ लगता है.. '' वैभव झुन्झुलाया
''ओके तुम लोग बैठो मैं ले कर आता हूँ'' अविनाश ने कहा
अविनाश उठकर पानी लेने चला आया


''माँ वो देखो लगता है दो कुत्ते घूम रहे हैं'' विमुखी ने कहा
''वो तो घूमते ही रहते हैं...''
''पर इनकी पूँछ कुछ ज्यादा ही बड़ी नहीं है..और ये इतनी धीमे क्यूँ चल रहे हैं?? '' वैभव ने कहा
'' ओ god !!'' अवंतिका के मुंह से निकला
''क्या हुआ माँ..?'' विमुखी ने पुछा
''कुछ नहीं तुम लोग बिलकुल हिलना डुलना नहीं वो हमारे काफी करीब आ चुके हैं..''
''ये... गुर्राने के बजाये दहाड़...ओ god !! माँ... ये तो शेर...'' बस इतना ही निकल पाया वैभव के मुंह से...

शेर उनके बहुत करीब पहुँच चुके थे.. काफी करीब पहुँच चुके थे...विमुखी, अवंतिका और वैभव की सांसे बहुत तेज चलने लगीं.. सब सांस रोक कर बैठे ही रह गए.. जब तक शेर छलांग मर कर unpar attack करता.... लाइट आ गई.. बाहर लगा 500 वाट का बल्ब ऐसा जला कि शेर कुछ समझ भी नहीं पाए और मेरी आंख खुली तो मैने खुद को पसीने से तर बतर पाया..

हुह... मैं सपना देख रही थी... समय देखा तो सुबह के चार बजे थे..मैने उठकर पानी पीया और फिर से आकर सो गई.. काफी देर तक ये सपना जेहन में चलता रहा फिर मैने इसी टॉपिक पर ब्लॉग लिख डाला.
सो.. how was your experience this time??

Sunday, August 22, 2010

कभी तो need में मिलो यार....ऐसा क्या काम आ जाता है हर बार...


अंग्रेजी की एक कहावत है '' A friend in need is a friend indeed''. इसका सही मतलब तब समझ में आता है जब आपको सच में एक अदद मित्र की ज़रुरत हो और वो हर बार किसी न किसी काम से फँस जाये.. ऐसा एक बार हो तो समझ आता है पर हर बार होने लगे तो इसको क्या कहा जाये.. कहने को वो दोस्त है... हर बार साथ में मस्ती करना सुख दुःख बाँटना भले ही मिल न पाएं पर फ़ोन पर घंटो बतियाना..

सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब कहीं पर एक साथ जाने की पूरी प्लानिंग कर लो और ऐन टाइम पर उन लोगों को कोई काम पड़ जाए..पर क्या करें दोस्त है भाई थोड़ी देर नाराज़ ही तो हुआ जा सकता है.. मेरे साथ तो ये हमेशा ही हुआ है... मेरी दो सहेलियां....ओ god कभी भी मौके पर मिल जायें तो बात है.. इस बार भी यही हुआ...मुझे गुस्सा तो बहुत आया फिर सोचा कोई बात नहीं...अकेले हैं तो क्या गम है...

हम खुद ही एन्जॉय करेंगे...पर सही बताऊँ तो उनके बिना एन्जॉय करने में कोई मज़ा भी नहीं....आफ्टर all we are friends...Better luck next time....!!! यही बोल कर और सोच कर अपना मन बहला लती हूँ...इस संकट की स्थिति में आप क्या करते हैं??? 

Tuesday, August 17, 2010

पावर ऑफ साइलेंस

''कुछ उनकी नज़र ने उठ के कहा, कुछ मेरी नज़र ने झुक के कहा, झगडा जो न बरसों में चुकता, तय हो गया बातों बातों में'' आँखों की भाषा ही ऐसी होती है. कई बार बिना कुछ कहे ही इंसान बहुत कुछ कह जाता है. सोचने का विषय है कि इंसान जब कुछ बोलता नहीं तो सामने वाले को महसूस कैसे हो जाता है....आप लोग मेरी बातों से कितना सहमत होंगे, ये तो नहीं पता..पर कई बार कुछ न कहना ही सामने वाले के लिए बहुत होता है...

इस बिन बोले जज्बात को ऑंखें सबसे पहले बयां करती हैं, बहुत दिनों बाद अगर किसी दोस्त से मिलिए तो सबसे पहले एक प्रश्नचिंह अरे तुम यहाँ कैसे ? किसी दोस्त ने आपका दिल दुखाया...आपको बेहद तकलीफ हुई....इस परिस्थिति में आपके गुस्सा करने से ज्यादा आपका चुप रह जाना उसे कचोटता है... अंततः इस बात को समझने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास होता है... है न कमाल की बात!!! आपने कहा तो कुछ भी नहीं पर उसका असर काफी तगड़ा हुआ...कभी आजमा कर देखिएगा






इसी तरफ आपके दिल का सबसे करीबी दोस्त जिससे आप कई दिनों बाद मिल रहे हों, पहले तो मिलते ही खूब सारी बातें बताने का मन करता है लेकिन सामने आते ही सिर्फ चेहरे पर एक मुस्कराहट होती है जो आपके अंदर के सारे एहसासों और जज्बातों को बयां कर देती है...
मैने अक्सर मंदिरों में भगवन के सामने भी लोगों को आंसु बहाते देखा है. ये तो नहीं जानती कि इसके पीछे कारण क्या रहा होगा पर मंदिर से लौटते वक्त उनके चेहरे पर आत्मीय संतोष और सुख की अनुभूति को भी महसूस किया है. यूँ तो कहने को बिना कहे भी बहुत कुछ कहा जा सकता है कुछ बातों को कहना नहीं पड़ता आँखों कि बोली ही अंतर्मन में चल रहे विचारों को बयां कर देती है. आपकी ख़ुशी, आपके गम, कोई परेशानी, यहाँ तक कि आपकी शैतानी भी आँखों के ज़रिये पकड़ में आ जाती है. शायद इसीलिए कहा जाता है ''स्पीच इज सिल्वर बट साइलेंस इज गोल्ड''
ऐसा नहीं है कि सिर्फ इंसानी जज्बात ही खुद को बयां कर पाते हैं!



कई बार प्रकृति भी अपने आप को जाहिर करती है..अक्सर मन में चल रहे अंतर्द्वंद को प्रकृति भी समझ जाती है या यूँ कहें कि आप अपनी भाषा उसे बताते नहीं बल्कि वो अपनी भाषा में आपका दर्द और ख़ुशी बांटती नज़र आती है आप खुश है तो लगता है सारी कायनात आपके साथ झूम रही है अगर आप दुखी हैं तो हजारों की भीड़ में भी आप खुद को तनहा पाते हैं..ऐसे में सिर्फ नदी का किनारा या पेड़ कि घनी छाँव के नीचे बैठ कर ही मन को सुकून मिल पाता है, अब आप निर्णय लीजिये क्या ये प्रयोग आप खुद पर भी करेंगे ???