Sunday, July 18, 2010

दिल टूटने से अच्छे लेखन का क्या सम्बन्ध...


इस बार व्यस्तता ज्यादा होने के कारण कुछ नया नहीं लिख रही हूँ.. मन में चल रहे एक प्रश्न की जिज्ञासा को शांत करने के लिए इस बार ब्लॉग का टॉपिक है जरा हट के क्या वाकई किसी अज़ीज़ के दूर चले जाने पर, या किसी कारणवश संपर्क में न रहने पर दिल का दर्द लेखन से सामने आता है??
एक दिन इसी विषय पर चर्चा चल रही थी...कई लोगों ने इस बात को माना कि प्रेम में असफल व्यक्ति लेखन में सफल होता है. इस बात को मानने वालों में वरिष्ठ जनों की संख्या ज्यादा थी जबकि अपनी युवाओं की फ़ौज में कुछ ही लोग इस बात से सहमत हो पाए.  एक का कहना था कि प्रेम में असफल होकर इंसान इस लायक ही नहीं रह पता कि कुछ कर सके जबकि दूसरे का कहना था अच्छी लेखनी की कला किसी किसी में ही होती है कई लोगों में ये कला इश्वर ने प्राकृतिक रूप से दी होती है जबकि कुछ इस कला को सीख कर भी अच्छा लिखने लगते हैं. मैं इन दोनों ही बातों से सहमत हूँ क्यूंकि मेरी जानकारी में कई लोग ऐसे हैं जिन्होने ठोकर खाने या फिर प्रेम में असफल होने के बाद शेरो शायरी पढने, सुनने सुनाने में रूचि दिखाई और वे काफी अच्छा लिखते हैं. कई ऐसे भी हैं जिन्हे ये कला भगवान् ने दी और कई ऐसे भी है जिन्होने दूसरों को देख कर अपनी लेखन शैली को प्रभावशाली बनाया. पर मेरे मन कि जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई है...

अभी भी मैं इस प्रश्न का उत्तर जानने को इक्शुक हूँ कि प्रेम में असफल होने और अच्छे लेखन में क्या रिश्ता है?? क्या मेरे इस प्रश् न उत्तर है आपके पास??

Sunday, July 4, 2010

काश हम बच्चे ही रहते ....

आज बड़े दिनों के बाद ऑफिस से पूरी तरह से छुट्टी मिली.. सुबह ही दो दोस्तों का फ़ोन आ गया..खूब सारी बातें हुईं...बहुत अच्छा लगा.. कॉलेज और स्कूल के दिनों की यादें ताज़ा हो गईं.

मुझे education subject कभी अच्छा नहीं लगता था...फिर भी मैं क्लास की representative थी. अंग्रेजी और भारतीय प्राचीन इतिहास का representative  भी मुझे ही बनाया गया था इंटर के समय मैं कमेटी की vice प्रेसिडेंट रही. लंच के बाद जब हम round पर निकलते तो बच्चे जल्दी से क्लास में चले जाते. batch मिल जाने के बाद कैंटीन में जाना अजीब लगता था क्यूंकि बच्चे हमसे लिहाज के कारण वहां मस्ती नहीं कर पाते .. बाद में मैने कैंटीन जाना ही बंद कर दिया..फिर आई कॉलेज लाइफ में वो दिन थे बहुत अच्छे... दोस्तों के साथ मस्ती करना, साथ में घूमना, साथ में पढाई करना, साथ में क्लास बंक करना और साथ में टीचरों की डांट खाना, हालाँकि बी.ए. थर्ड इयर में ही क्लास बंक करने की हिम्मत पड़ी थी.. लेकिन  मैम ने उसी दिन लड़कियों की क्लास ले ली.. क्या करूँ.. bad luck... पर कोई नहीं... उसके बाद दोबारा हिम्मत की और इस बार हम कामयाब रहे. उस दिन बारिश हो रही थी क्लास लेट पहुँचने पर बाहर कर दिए जाने से अच्छा कैंटीन में चाए पीना सही समझा.... फिर मैने और मेरी दोस्त ने चाए के साथ parle g बिस्किट का एक पैकट लिया और चाए कि चुस्कियों के साथ बारिश की फुहारों का आनंद लिया. बारिश होने तक हम वहीँ रहे... उसके बाद बाकी के क्लास करने के बाद वापस घर... किस्सा यहीं ख़तम नहीं हुआ.. अगले दिन जब कॉलेज गई तो मुझे और राशी को मैम ने बुलाया... क्लास में सबके सामने पुछा 'कल क्लास में क्यूँ नहीं आयीं थीं?? क्लास representative हो... तुम ही गायब थी??' मैने कहा मैम कल क्लास में आने में देर हो गई थी..क्लास का दरवाजा बंद था आप अंदर पढ़ा रही थीं...आपने कह भी रखा है कि late comers are not allowed in my class... इसलिए हम बाहर से ही चले गए.'' ''कहाँ गयीं फिर?'' ''मैने मासूमियत से कहा, कैंटीन चली गई थी राशी के साथ वहां पर चाए पी फिर टाइम होने पर दूसरे क्लास कर के हम घर चले गए'', इतना सुनना था कि अंसारी मैम जोर से हंसीं और मेरे गाल पे थपथपाते हुए बोलीं ''मैं उन बच्चों को आने से मना करती हूँ जो पढाई के अवाला क्लास में सब कुछ करते हैं...अगली बार से लेट हो जाओ तो क्लास में पीछे की तरफ से आकर बैठ जाना मैं कुछ नहीं कहूँगी..''

उस दिन जाना की सच्चाई बोल देने से बहुत से काम आसान हो जाते हैं... इस तरह के एक नहीं कई किस्से थे जिन पर हम (मैं और मेरे दोस्त) आज भी चर्चा करते हैं..खासकर वो समय बिलकुल नहीं भूलता जब exam होने वाले होते थे और हम एक दूसरे को msg कर करके पूछते रहते ओये!! कौन सा चैप्टर पढ़ रही है??  इत्ता सारा पढ़ लिया?? ये वाला question मुझे याद नहीं हो रहा है..तूने याद कर लिया क्या?? सोने से पहले मिस कॉल करना मत भूल जइयो...या फिर सुबह उठाने के लिए मिस कल पे मिस कॉल चलते रहते थे कई बार मेरी आंख तो नहीं खुलती लेकिन अगले रूम से दादी आकार जरूर चिल्लाने लगती थीं...''पता नहीं कैसे दोस्त हैं?? कैसे पढाई होती है?? पढाई को भी खेल बना लिया है?? जब देखो तब मोबाईल टूं-टूं करता रहता है..अभी तक सो रहीं हैं देर होने लगेगी तो भागेंगी...''

मेरे ऊपर कोई फर्क न पड़ता..घर से निकलने से पहले फिर एक दूसरे को फ़ोन करते और कॉलेज में मिलते ही ऐसे बिहैव करते जैसे सालों बाद मिल रहे हों... एक जोर की  झप्पी के बाद All The Best कहते और क्लास में भाग जाते... जिसका पेपर पहले ख़तम हो जाता वो भाग कर दूसरे की क्लास के सामने तैनात हो जाता ''कितना लिखोगी यार!!! बाहर निकलो...इतना लिखने का फायदा नहीं है...नंबर उतने ही मिलने हैं...तो काहे को सिर खपा रही हो..'' दोस्त के चेहरे के भाव से पता चलता कि उस समय मैं ही उसे उसकी सबसे बड़ी दुश्मन नजर आ रही हूँ ....ऑंखें तरेर के वो बोलती '' बच्चू निकल लो यहाँ से नहीं तो....'' वो घूंसे बना कर मारने का इशारा करती.. मैं जोर से हंसती और stationary की दुकान जो हमारे कॉलेज campus में थी वहां पर इंतज़ार करती.. बहुत सारे दोस्त मिलते..बातें होती.. आज जब मुड़कर उस दौर को देखती हूँ तो लगता हैं कि वो समय अब लौट कर नहीं आ सकता...मिलते तो हम आज भी हैं लेकिन आज मस्ती के साथ ही गंभीर विषयों पर भी बात होती है..

कई बार दिल दुखा देने वाली बातें भी सुनने में आती हैं....फिर मन यही कहता है.... काश हम बड़े नहीं हुए होते....