Sunday, May 2, 2010

अब आपकी बारी है...

आज ऑफिस से घर लौटते वक़्त एक ऐसी तस्वीर आँखों के सामने आ गई कि कुछ देर के लिए मन सोचने पर मजबूर हो गया कि  क्या कभी इस दिशा में भी कोई काम किया जा सकता है?? हुआ यूँ कि मैं अपने ऑफिस से जागरण चौराहे की ओर जा रही थी. टाइमस ऑफ़ इंडिया के ऑफिस के पास एक पान वाले कि गुमटी है. मैने देखा कि वहां से ७ से ९ साल कि बच्चियों जिनके हांथ में कूड़ा बीनने के लिए बोरा पकड़ा था उनमें से सबसे बड़ी लड़की ने एक रूपये का पान मसाला लिया, पुडिया को फाड़ा ओर तीनों ने उसके तीन हिस्से लगाये ओर अपनी भाषा में बात करते गुए तीनों वहां पडे हुए ईंटों पर बैठ गईं ओर आपस में हंसी ठिठोली करतीं रहीं. मुझसे रहा नहीं गया मैं वहां पर खडे हो कर उन्हे काफी देर तक देखती रही. तीनो कि निश्छल हंसी ओर अजीब सी भाषा में बातचीत जैसे कोई नया सुर निकल रहा था. तीनों आपस में बात करने में इतनी मगन थीं कि इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि मैं उनकी गतिविधियों को देख रही हूँ. वह तीनो थोड़ी देर में चली गयीं लेकिन मैं यही सोचती  रही कि आखिर क्यूँ इन बच्चों को तम्बाकू खाने की लत लग जाती है. गरीबी ओर बेकारी में क्या सिर्फ कुछ रूपये में मिलने वाली पुडिया इनकी भूख को रोक देती है??? सुबह से शाम तक ये कूड़ा बीनते हैं उसे बचने के बाद जो पैसे मिलते हैं उससे खाना मिलता है. फिर भी ऐसी कौन सी बात है कि मन रुक ही नहीं पता  है. 
ये तो बात हुई इन बच्चों की पर बडे भी कुछ कम नहीं. कई दोस्तों को सिगरेट पीने के लिए मना किया. एक ने बड़ी मुश्किल से सिगरेट पीना छोड़ दिया लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जो चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे हैं... मेरा कहना है उस पदार्थ का सेवन करना ही क्यूँ जिसको मुंह में खाने के बाद दोबारा पीक के रूप में थूका जाता है. जब पता है कि इसे थूकना ही है फिर भी लोग पता नहीं क्यूँ इसे खाते हैं?? सिगरेट के काश लेने का क्या फायदा जब उसे धुंए के रूप में अंदर जाना है या बाहर उड़ जाना है?? ये खुद के लिए तो नुक्सान दायक है ही सामने वाले के लिए भी खराब होता है. टाक्सी हो या ऑटो या फिर कार और बस जो लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं उसकी पीक सडकों पर थूकते हैं. ऑफिस के बाथरूम हों या फिर दीवारों के कोने, ये भी उनसे अछूते नहीं रह जाते. सोचिये नवाबों के शहर में आकर घूमने वाले लोगों को ये कितना खराब लगता होगा कि इस शहर के लोग अपने ही शहर को साफ़ सुथरा नहीं रख सकते... अभी कुछ महीनों पहले ही ऑस्ट्रालिया के एक नागरिक से बात करने का मौका मिला जब उससे इस शहर के बारे में पुछा तो वह बोला यहीं पर लोग अच्छे हैं, बहुत जल्दी दोस्त बन जाते हैं दूसरों की मदद भी करते हैं यहाँ का खाना लाजवाब  है..  मैने उससे पुछा यहाँ की कोई एक चीज़ ऐसी चीज़ जो आपको पसंद नहीं आयी?? उसने कहा,''यहाँ की सड़कें साफ़ नहीं होतीं... कई बार लोग थूकते हैं जिसकी गन्दगी देखकर मन ख़राब हो जाता है! ''
बात तो सही है गन्दगी जो करता है उसे समझ नहीं आता कि उससे गलती हुई कहाँ?? खैर मेरा मानना है कि अगर हम चाहते हैं कि इस समस्या का समाधान हो तो हम सबको इस बारे में सोचना पड़ेगा. मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं लोगों को धुम्रपान न करने की सलाह देती रहूँ. जो लोग तम्बाकू का सेवन कर के सड़कों पर थूकते है उन्हे भी कई बार समझती हूँ भले ही उम्हे बुरा लगे.. आपसे भी इतना ही अनुरोध है कि अगर हो सके तो लोगों को धूम्रपान के नुक्सान बताइए. इसकी शुरुआत अपने किसी खास व्यक्ति से की जा सकती है. मैने तो एक व्यक्ति कि सिगरेट बंद करवा दी आगे भी कोशिश जारी है... अब आपकी बारी है...


23 comments:

  1. बहुत अच्छे......
    आप का नजरिया समाज सुधारक है लेकिन इन सबका का कोई न कोई कारण तो होगा की लोग कुछ दिन अपने को कण्ट्रोल करने के बाद वापस उ़सी को अपना लेते है.

    क्या हमारी कोशिश में कमी है या संगत का...

    दोस्त......

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  2. संवेदनात्मक आधार पर नजरिया सराहनीय है । सामाजिक मूल्यों के निर्माण के लिए शिक्षा और न्यायपरक व्यवस्था का होना जरूरी है जो फिलहाल हमारे यहां दूर की कौड़ी लग रही है । ऐसे में दोष न तो बच्चों का है, न समाज का । मात्र सुधारात्मक नजरिये से बुनियादी बदलाव नही होते ।
    सुभाष

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  3. बच्चे बहुत प्यारे लगते है.... अच्छी कोशिश....

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  4. नशे का और भूख दोनों का पुराना रिश्ता है और अब इसका असर बच्चों पर भी दिख रहा है. आप की कोशिश जरूर असर लायेंगे. अगर आप इसकी जड़ में जाय और किसी को इस से दूर रख सके तो आप का पर्यास सफल होगा.

    H S

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  5. ek behtareen prayaas... bas ese hi chalte rahiye...

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  6. gud approach. keep it up.

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  7. kya baat hai.. Kya likha hai

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  8. Angle's World ka kya matlab hai ??

    Are you Angle for the Children !!

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  9. u r such a emotional person but u can change something by ur writing...

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  10. Angle ka matlab hota hai "Farishta". Main ek sadharan insaan hun. Han bachchon ke prati mere man mein ek alag jagah hai, isliye kyunki unki masoomiyat mujhey achchi lagti hai.

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  11. aakhir masoom insaano ko hi bachche achche lagte hai, vo dharti par farishto ka roop hote hain or aap bhi unki hi tarah ho...

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  12. m waiting for ur new true story...

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  13. nice pic.. lag raha hai koi bada journalist media field me dastak de chuka hai...

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  14. new story kab aayegi...

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  15. story ki ploting chal rahi hai. Jald hi ap ussey dekh sakengey. Thanks!!!

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  16. arey bhaiya ploting kab tak chalgei... lagta hai aapka likhne ka utsaah feeka pad gaya hai... write something new... m waiting...

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  17. Achcha laga ye jaan ker ki ap stories ke intezar mein hain. Is bar jara alag vishay par likhney ki soch rahi hun, thoda samay to lagega hi :)

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  18. ek fariyaadi aapke blog ke dar par roz aata hai... kundi khatkhatata hai... or uski nazre talashti hai shayad aaj koi is blog ke darwaaje se bahar niklega or kahega... ye vahi special true story hai jiska aapko besabree se intzaar tha...

    kuch naya to nahi ho sakta bas kosis ki hai journalists ki tarah sochne ki...shayad vo apni baat ko isi andaaz me kah dete hai jo sunane me achchi lagti hain...

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  19. aapka blog bahut sundar hai, or kafi emotional likha bhi hai, padkar lagta hai jaise aap bhi ek bachche ki hi tarah hai:)

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  20. very goooooooood story.i think apko hi nahi sabko yahi soch kar bahar nikal na chahiye ki koi bhi vyakti agar aisa galat kaam karta hai to usey samjhana chahiye na ki dantna.
    well done.

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  21. 1. I shall use only a few words:You got talent. Must continue. Do publish your stories.

    2. As for your pondering over possible relationship between rejection/ failure in love and cretivity, I have one possible explanation to offer : The situation leads to a kind of detachment, allowing the person to become more antarmukhi, to achieve freedom from the intrusive environment and to focus. This is very necessary for thoughtful writing. However, this is not an essential condition to be a creative writer. Other situations that may lead to similar state will also promote sensitive writing. Intrinsic talent and recognition will sustain this creative activity.

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