Sunday, October 17, 2010

Tu nahi to kuch bhi nahi....

Main apney jeevan ki kalpana bhi uskey bina nahi kar sakti. Prakriti ki awaz, hawaon ki sarsarahat, chidiyon ki chehchahahat, nadiyon ke behney mein or barish ki rimjhim bundon mein bhi to sangeet hi niwas karta hai.. fir main uskey prem se achchuti kiasey reh sakti hun,, han mujhey pyaar hai sangeet se..

ek aisa dost jo na sirf apki khushnuma palon mein balki tanhaiyon mein bhi apka saath nibhata hai.. bachpan se hi music se lagaw raha.. badi ichchaa thi ki bhatkhndey join karun par kabhi mauka nahi mil paya.. aj bhi jab kisi kam ko karney mein concentrate karney ki zaroorat hoti hai earphone mein ganey zaroor sunti hun.. kisi topic se dhyan hatana ho to volume badha ke full sound kar gana suniye i bet ap thodi der mein relax feel karney lagengey...
Adat aisi pad gai hai ki music ke bina kuch kar hi nahi pati... kitchen mein chai bhi banani ho to bhi mobile ke playlist par songs laga ke sunti hun. Music na sirf dimag ki thakan door karta hai balki dil ko sukoon bhi deta hai.. Han ye alag baat hai ajkal ke dhinchak dhinchak songs main pasand nahi karti... Old melodies ko sunney ka maza ajkal ke ganon mein nahi...

But anyways... I love music and i can't think my world without it... but its amazing ki kuch log aisey bhi hai jinhey songs ka fobiya hai... vo kisi bhi ganey ko sun hi nahi patey.. infact they get irritated.. i keep on thinking ki aisey log bhi hotey hain.. but anyways...ab or kya likhun is samay bhi main ek song hi sun rahi hun.. my fvrt song..have a nice day hope u will love these songs.. Enjoy!!


TANHAYEE DIL CHAHTA HAI

Tere liye meri sansee Ek Ajnabee

Banda Re-Raaz 2-Original Complete Song-Really HD-DVD Rip

Tuesday, August 31, 2010

शेर ने छलांग लगाई और......

वीरान जगह पर हंसते खेलते परिवार का बसेरा था...रोज की तरह ही 11 साल की विमुखी और 12  साल के वैभव साथ में खेल रहे थे... ''
''माँ आइये ना आप भी हमारे साथ खेलिए!!'' विमुखी ने किचन में खाना बनो रही माँ से कहा.
''तुम लोग खेलो बेटा...मैं खाना बना लूँ... शाम के सात बजने वाले हैं, तुम्हारे पापा आते ही होंगे. वो आ जायें फिर सब साथ में खेलेंगे.. ओके??
''ओके माँ आई विल वेट फॉर यू..''
''येस बेबी...मैं पक्का आउंगी''
उसके बाद विमुखी और वैभव छिपन-छिपाई खेलने लगे..

''माँ, पापा अभी तक नहीं आये ?? '' वैभव ने हाँथ पैर धोकर पुछा.
''नहीं बेटा पता नहीं क्या हुआ अभी तक कोई फ़ोन भी नहीं किया, तू जरा उनको फ़ोन कर के देख !!''
''दि नंबर यू आर ट्राइंग टू कॉल इज नॉट रीचेबल...''
''माँ पापा का फ़ोन मिल नहीं रहा...''
''चलो कोई बात नहीं, मैं थोड़ी देर में फिर से मिला लूंगी..विमुखी कहाँ है! उससे कहो अपना होम वर्क कर ले.. ''
''माँ वो बैग ले कर रूम में ही पढने गई है...''
आधे घंटे बाद ही पापा आ गए..
''कहाँ रह गए थे आप..आपका फ़ोन भी नहीं मिल रहा था...इज एवरीथिंग फाइन??'' अवंतिका ने अविनाश से पुछा
''कुछ नहीं.. एक खबर मिली थी कि इस इलाके में दो शेर घुस आएं हैं...ऑफिस में जब सूचना मिली तो सबको गाड़ी से भिजवाया गया...इसलिए थोड़ी देर हो गई...''
''शेर...??''
''हाँ!! पास के जंगलों से यहाँ आ गए हैं...फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट के लोग ढूंढ रहे हैं...मिलते ही पकड़ कर उनके क्षेत्र में छोड़ आयेंगे..''
''पर...''
''तुम परेशान मत हो... सब कुछ ठीक है...''
''पर कुछ हो गया तो... जानवरों का क्या भरोसा?? यहाँ पर ज्यादा आबादी भी नहीं है...''
''ओ कम ऑन अवंतिका अगर तुम भी डर गई तो कैसे काम चलेगा?? अच्छा सुनो बच्चों को कुछ मत बताना. वो डर जायेंगे..''
''ओके!!''
'' विमुखी...वैभव.... कहाँ हो सब भाई... आज मेरे साथ खेलना नहीं है क्या?? अविनाश ने बच्चों को आवाज़ लगाई तो दोनों भाग कर उसके पास आ गए.
''पापा आज आपको इतनी देर कैसे हो गई...'' दोनों ने एकसाथ पुछा
'' कुछ नहीं बेटा...ऑफिस में थोड़ा काम आ गया था...दोनों ने पढ़ाई कर ली??''
''येस..'' दोनों फिर से साथ में बोले
''ओके..तो चलो हो जाये पिल्लो फाईट??''

''नो नो अवि..पिल्लो फाईट नहीं..पूरा बिस्तर ख़राब हो जाता है.. ''
''ओके तो फिर छिपन छिपाई कौन खेलेगा??'' अविनाश ने विमुखी को गुदगुदी मचाते हुए पुछा
''हम दोनों खेलेंगे...ये...'' वैभव जोर से चिल्लाया
''ओके पहले मैं छिपऊँगा.. बारी-बारी से तुम लोग..ओके??
''ओके...'' विमुखी का ये वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था की लाइट चली गई...
''ओ नो....'' सब एक साथ और एक स्वर में बोले...
''अब क्या करें??''
''कुछ नहीं बाहर जाकर खेलते हैं.. '' वैभव बोला
''नो नो बाहर नहीं..तुम लोग जानते नहीं हो... इतनी रात है कुछ हो गया तो...चलो नॉव.. खाना खा के सो जाओ..'' अवंतिका ने कहा
''पर माँ प्लीज़...मुझे पापा के साथ खेलना है..''
''ओके ओके इस बात पर कोई बहस नहीं करेगा...मेरे पास एक तरकीब है.. जिससे हम खेल भी सकेंगे और बच्चों का दिल भी नहीं टूटेगा!!'' अविनाश ने कहा
''हम बाहर जायेंगे..लेकिन केवल अन्ताक्षरी ही खेलेंगे ओके?? ''
''ओके''
चार कुर्सियां सज गईं.. सब घर के दरवाजे के पास ही.
''पर मुझे पानी पीना है...'' विमुखी ने कहा
''अरे यार.. तुमको तो मेन टाइम पर ही ये सब क्यूँ लगता है.. '' वैभव झुन्झुलाया
''ओके तुम लोग बैठो मैं ले कर आता हूँ'' अविनाश ने कहा
अविनाश उठकर पानी लेने चला आया


''माँ वो देखो लगता है दो कुत्ते घूम रहे हैं'' विमुखी ने कहा
''वो तो घूमते ही रहते हैं...''
''पर इनकी पूँछ कुछ ज्यादा ही बड़ी नहीं है..और ये इतनी धीमे क्यूँ चल रहे हैं?? '' वैभव ने कहा
'' ओ god !!'' अवंतिका के मुंह से निकला
''क्या हुआ माँ..?'' विमुखी ने पुछा
''कुछ नहीं तुम लोग बिलकुल हिलना डुलना नहीं वो हमारे काफी करीब आ चुके हैं..''
''ये... गुर्राने के बजाये दहाड़...ओ god !! माँ... ये तो शेर...'' बस इतना ही निकल पाया वैभव के मुंह से...

शेर उनके बहुत करीब पहुँच चुके थे.. काफी करीब पहुँच चुके थे...विमुखी, अवंतिका और वैभव की सांसे बहुत तेज चलने लगीं.. सब सांस रोक कर बैठे ही रह गए.. जब तक शेर छलांग मर कर unpar attack करता.... लाइट आ गई.. बाहर लगा 500 वाट का बल्ब ऐसा जला कि शेर कुछ समझ भी नहीं पाए और मेरी आंख खुली तो मैने खुद को पसीने से तर बतर पाया..

हुह... मैं सपना देख रही थी... समय देखा तो सुबह के चार बजे थे..मैने उठकर पानी पीया और फिर से आकर सो गई.. काफी देर तक ये सपना जेहन में चलता रहा फिर मैने इसी टॉपिक पर ब्लॉग लिख डाला.
सो.. how was your experience this time??

Sunday, August 22, 2010

कभी तो need में मिलो यार....ऐसा क्या काम आ जाता है हर बार...


अंग्रेजी की एक कहावत है '' A friend in need is a friend indeed''. इसका सही मतलब तब समझ में आता है जब आपको सच में एक अदद मित्र की ज़रुरत हो और वो हर बार किसी न किसी काम से फँस जाये.. ऐसा एक बार हो तो समझ आता है पर हर बार होने लगे तो इसको क्या कहा जाये.. कहने को वो दोस्त है... हर बार साथ में मस्ती करना सुख दुःख बाँटना भले ही मिल न पाएं पर फ़ोन पर घंटो बतियाना..

सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब कहीं पर एक साथ जाने की पूरी प्लानिंग कर लो और ऐन टाइम पर उन लोगों को कोई काम पड़ जाए..पर क्या करें दोस्त है भाई थोड़ी देर नाराज़ ही तो हुआ जा सकता है.. मेरे साथ तो ये हमेशा ही हुआ है... मेरी दो सहेलियां....ओ god कभी भी मौके पर मिल जायें तो बात है.. इस बार भी यही हुआ...मुझे गुस्सा तो बहुत आया फिर सोचा कोई बात नहीं...अकेले हैं तो क्या गम है...

हम खुद ही एन्जॉय करेंगे...पर सही बताऊँ तो उनके बिना एन्जॉय करने में कोई मज़ा भी नहीं....आफ्टर all we are friends...Better luck next time....!!! यही बोल कर और सोच कर अपना मन बहला लती हूँ...इस संकट की स्थिति में आप क्या करते हैं??? 

Tuesday, August 17, 2010

पावर ऑफ साइलेंस

''कुछ उनकी नज़र ने उठ के कहा, कुछ मेरी नज़र ने झुक के कहा, झगडा जो न बरसों में चुकता, तय हो गया बातों बातों में'' आँखों की भाषा ही ऐसी होती है. कई बार बिना कुछ कहे ही इंसान बहुत कुछ कह जाता है. सोचने का विषय है कि इंसान जब कुछ बोलता नहीं तो सामने वाले को महसूस कैसे हो जाता है....आप लोग मेरी बातों से कितना सहमत होंगे, ये तो नहीं पता..पर कई बार कुछ न कहना ही सामने वाले के लिए बहुत होता है...

इस बिन बोले जज्बात को ऑंखें सबसे पहले बयां करती हैं, बहुत दिनों बाद अगर किसी दोस्त से मिलिए तो सबसे पहले एक प्रश्नचिंह अरे तुम यहाँ कैसे ? किसी दोस्त ने आपका दिल दुखाया...आपको बेहद तकलीफ हुई....इस परिस्थिति में आपके गुस्सा करने से ज्यादा आपका चुप रह जाना उसे कचोटता है... अंततः इस बात को समझने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास होता है... है न कमाल की बात!!! आपने कहा तो कुछ भी नहीं पर उसका असर काफी तगड़ा हुआ...कभी आजमा कर देखिएगा






इसी तरफ आपके दिल का सबसे करीबी दोस्त जिससे आप कई दिनों बाद मिल रहे हों, पहले तो मिलते ही खूब सारी बातें बताने का मन करता है लेकिन सामने आते ही सिर्फ चेहरे पर एक मुस्कराहट होती है जो आपके अंदर के सारे एहसासों और जज्बातों को बयां कर देती है...
मैने अक्सर मंदिरों में भगवन के सामने भी लोगों को आंसु बहाते देखा है. ये तो नहीं जानती कि इसके पीछे कारण क्या रहा होगा पर मंदिर से लौटते वक्त उनके चेहरे पर आत्मीय संतोष और सुख की अनुभूति को भी महसूस किया है. यूँ तो कहने को बिना कहे भी बहुत कुछ कहा जा सकता है कुछ बातों को कहना नहीं पड़ता आँखों कि बोली ही अंतर्मन में चल रहे विचारों को बयां कर देती है. आपकी ख़ुशी, आपके गम, कोई परेशानी, यहाँ तक कि आपकी शैतानी भी आँखों के ज़रिये पकड़ में आ जाती है. शायद इसीलिए कहा जाता है ''स्पीच इज सिल्वर बट साइलेंस इज गोल्ड''
ऐसा नहीं है कि सिर्फ इंसानी जज्बात ही खुद को बयां कर पाते हैं!



कई बार प्रकृति भी अपने आप को जाहिर करती है..अक्सर मन में चल रहे अंतर्द्वंद को प्रकृति भी समझ जाती है या यूँ कहें कि आप अपनी भाषा उसे बताते नहीं बल्कि वो अपनी भाषा में आपका दर्द और ख़ुशी बांटती नज़र आती है आप खुश है तो लगता है सारी कायनात आपके साथ झूम रही है अगर आप दुखी हैं तो हजारों की भीड़ में भी आप खुद को तनहा पाते हैं..ऐसे में सिर्फ नदी का किनारा या पेड़ कि घनी छाँव के नीचे बैठ कर ही मन को सुकून मिल पाता है, अब आप निर्णय लीजिये क्या ये प्रयोग आप खुद पर भी करेंगे ???

Sunday, July 18, 2010

दिल टूटने से अच्छे लेखन का क्या सम्बन्ध...


इस बार व्यस्तता ज्यादा होने के कारण कुछ नया नहीं लिख रही हूँ.. मन में चल रहे एक प्रश्न की जिज्ञासा को शांत करने के लिए इस बार ब्लॉग का टॉपिक है जरा हट के क्या वाकई किसी अज़ीज़ के दूर चले जाने पर, या किसी कारणवश संपर्क में न रहने पर दिल का दर्द लेखन से सामने आता है??
एक दिन इसी विषय पर चर्चा चल रही थी...कई लोगों ने इस बात को माना कि प्रेम में असफल व्यक्ति लेखन में सफल होता है. इस बात को मानने वालों में वरिष्ठ जनों की संख्या ज्यादा थी जबकि अपनी युवाओं की फ़ौज में कुछ ही लोग इस बात से सहमत हो पाए.  एक का कहना था कि प्रेम में असफल होकर इंसान इस लायक ही नहीं रह पता कि कुछ कर सके जबकि दूसरे का कहना था अच्छी लेखनी की कला किसी किसी में ही होती है कई लोगों में ये कला इश्वर ने प्राकृतिक रूप से दी होती है जबकि कुछ इस कला को सीख कर भी अच्छा लिखने लगते हैं. मैं इन दोनों ही बातों से सहमत हूँ क्यूंकि मेरी जानकारी में कई लोग ऐसे हैं जिन्होने ठोकर खाने या फिर प्रेम में असफल होने के बाद शेरो शायरी पढने, सुनने सुनाने में रूचि दिखाई और वे काफी अच्छा लिखते हैं. कई ऐसे भी हैं जिन्हे ये कला भगवान् ने दी और कई ऐसे भी है जिन्होने दूसरों को देख कर अपनी लेखन शैली को प्रभावशाली बनाया. पर मेरे मन कि जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई है...

अभी भी मैं इस प्रश्न का उत्तर जानने को इक्शुक हूँ कि प्रेम में असफल होने और अच्छे लेखन में क्या रिश्ता है?? क्या मेरे इस प्रश् न उत्तर है आपके पास??

Sunday, July 4, 2010

काश हम बच्चे ही रहते ....

आज बड़े दिनों के बाद ऑफिस से पूरी तरह से छुट्टी मिली.. सुबह ही दो दोस्तों का फ़ोन आ गया..खूब सारी बातें हुईं...बहुत अच्छा लगा.. कॉलेज और स्कूल के दिनों की यादें ताज़ा हो गईं.

मुझे education subject कभी अच्छा नहीं लगता था...फिर भी मैं क्लास की representative थी. अंग्रेजी और भारतीय प्राचीन इतिहास का representative  भी मुझे ही बनाया गया था इंटर के समय मैं कमेटी की vice प्रेसिडेंट रही. लंच के बाद जब हम round पर निकलते तो बच्चे जल्दी से क्लास में चले जाते. batch मिल जाने के बाद कैंटीन में जाना अजीब लगता था क्यूंकि बच्चे हमसे लिहाज के कारण वहां मस्ती नहीं कर पाते .. बाद में मैने कैंटीन जाना ही बंद कर दिया..फिर आई कॉलेज लाइफ में वो दिन थे बहुत अच्छे... दोस्तों के साथ मस्ती करना, साथ में घूमना, साथ में पढाई करना, साथ में क्लास बंक करना और साथ में टीचरों की डांट खाना, हालाँकि बी.ए. थर्ड इयर में ही क्लास बंक करने की हिम्मत पड़ी थी.. लेकिन  मैम ने उसी दिन लड़कियों की क्लास ले ली.. क्या करूँ.. bad luck... पर कोई नहीं... उसके बाद दोबारा हिम्मत की और इस बार हम कामयाब रहे. उस दिन बारिश हो रही थी क्लास लेट पहुँचने पर बाहर कर दिए जाने से अच्छा कैंटीन में चाए पीना सही समझा.... फिर मैने और मेरी दोस्त ने चाए के साथ parle g बिस्किट का एक पैकट लिया और चाए कि चुस्कियों के साथ बारिश की फुहारों का आनंद लिया. बारिश होने तक हम वहीँ रहे... उसके बाद बाकी के क्लास करने के बाद वापस घर... किस्सा यहीं ख़तम नहीं हुआ.. अगले दिन जब कॉलेज गई तो मुझे और राशी को मैम ने बुलाया... क्लास में सबके सामने पुछा 'कल क्लास में क्यूँ नहीं आयीं थीं?? क्लास representative हो... तुम ही गायब थी??' मैने कहा मैम कल क्लास में आने में देर हो गई थी..क्लास का दरवाजा बंद था आप अंदर पढ़ा रही थीं...आपने कह भी रखा है कि late comers are not allowed in my class... इसलिए हम बाहर से ही चले गए.'' ''कहाँ गयीं फिर?'' ''मैने मासूमियत से कहा, कैंटीन चली गई थी राशी के साथ वहां पर चाए पी फिर टाइम होने पर दूसरे क्लास कर के हम घर चले गए'', इतना सुनना था कि अंसारी मैम जोर से हंसीं और मेरे गाल पे थपथपाते हुए बोलीं ''मैं उन बच्चों को आने से मना करती हूँ जो पढाई के अवाला क्लास में सब कुछ करते हैं...अगली बार से लेट हो जाओ तो क्लास में पीछे की तरफ से आकर बैठ जाना मैं कुछ नहीं कहूँगी..''

उस दिन जाना की सच्चाई बोल देने से बहुत से काम आसान हो जाते हैं... इस तरह के एक नहीं कई किस्से थे जिन पर हम (मैं और मेरे दोस्त) आज भी चर्चा करते हैं..खासकर वो समय बिलकुल नहीं भूलता जब exam होने वाले होते थे और हम एक दूसरे को msg कर करके पूछते रहते ओये!! कौन सा चैप्टर पढ़ रही है??  इत्ता सारा पढ़ लिया?? ये वाला question मुझे याद नहीं हो रहा है..तूने याद कर लिया क्या?? सोने से पहले मिस कॉल करना मत भूल जइयो...या फिर सुबह उठाने के लिए मिस कल पे मिस कॉल चलते रहते थे कई बार मेरी आंख तो नहीं खुलती लेकिन अगले रूम से दादी आकार जरूर चिल्लाने लगती थीं...''पता नहीं कैसे दोस्त हैं?? कैसे पढाई होती है?? पढाई को भी खेल बना लिया है?? जब देखो तब मोबाईल टूं-टूं करता रहता है..अभी तक सो रहीं हैं देर होने लगेगी तो भागेंगी...''

मेरे ऊपर कोई फर्क न पड़ता..घर से निकलने से पहले फिर एक दूसरे को फ़ोन करते और कॉलेज में मिलते ही ऐसे बिहैव करते जैसे सालों बाद मिल रहे हों... एक जोर की  झप्पी के बाद All The Best कहते और क्लास में भाग जाते... जिसका पेपर पहले ख़तम हो जाता वो भाग कर दूसरे की क्लास के सामने तैनात हो जाता ''कितना लिखोगी यार!!! बाहर निकलो...इतना लिखने का फायदा नहीं है...नंबर उतने ही मिलने हैं...तो काहे को सिर खपा रही हो..'' दोस्त के चेहरे के भाव से पता चलता कि उस समय मैं ही उसे उसकी सबसे बड़ी दुश्मन नजर आ रही हूँ ....ऑंखें तरेर के वो बोलती '' बच्चू निकल लो यहाँ से नहीं तो....'' वो घूंसे बना कर मारने का इशारा करती.. मैं जोर से हंसती और stationary की दुकान जो हमारे कॉलेज campus में थी वहां पर इंतज़ार करती.. बहुत सारे दोस्त मिलते..बातें होती.. आज जब मुड़कर उस दौर को देखती हूँ तो लगता हैं कि वो समय अब लौट कर नहीं आ सकता...मिलते तो हम आज भी हैं लेकिन आज मस्ती के साथ ही गंभीर विषयों पर भी बात होती है..

कई बार दिल दुखा देने वाली बातें भी सुनने में आती हैं....फिर मन यही कहता है.... काश हम बड़े नहीं हुए होते....

Wednesday, June 16, 2010

वो एक फ़रिश्ता ही तो थी ...

 ''एन्जल'' यानि फ़रिश्ता... अक्सर दुःख या तकलीफ में लोग फरिश्तों के आने या उनके आस पास होने की बात करते हैं. कई बार किसी की जिंदगी में अचानक ही आ जाने वाला व्यक्ति भी एक एन्जल कि तरह ही लगने लगता है. ताज्जुब की बात ये है कि वो कब ओर कैसे आपकी जिंदगी में शामिल हो जाता है आप जान भी नहीं पाते... लेकिन जब वो चले  जाते हैं... तो बहुत तकलीफ होती है... लगता है जैसे जिंदगी वीरान हो गई... लेकिन अंग्रेजी कि एक कहावत है...The show must go on... इसलिए वो चलती रहती है. साथ बिताये लम्हों को यादों में समेटे हुए... पलकों पर बिछाये हुए..... कभी होठों पर एक मासूम हंसी लिए हुए तो कभी तकिये के ऊपर आँखों के किनारों से निकले आंसुओं के साथ. आज एक ऐसे ही फ़रिश्ते के बारे में बताती हूँ जिस के बारे में मुझे पता चला.

बहुत भोली, मासूम, निश्छल हंसी वाली, बोलती तो लगता जैसे मंदिर में हजारों घंटियों को किसी ने एक साथ बजा दिया हो... बात करती तो  जैसे हजारों फूल झडते... उसकी टन-टन आवाज़ जैसे कानों में कोई मधुर रस खोल घोल देती हो. बात करने भर से आधी चिंता अपने आप ही दूर हो जाती... इस बच्ची के बारे में मैने जाना ट्रेन से यात्रा के दौरान एक शख्स से, जिसने उस फ़रिश्ते को काफी करीब से  देखा ... बात होती रही और मुझे एक कुछ नया मिल गया आप लोगों को बताने को.. एक पत्रकार होने के नाते वैसे भी लोगों से बात चीत होती ही रहती है ऊपर से मेरी बहुत सारे सवाल पूछने की आदत का फायदा मुझे कई बार ऐसी ही कहानियां और ब्लोग्स लिखने के काम आ जाता है. उस शख्स से जो भी बात हुई उसमें कुछ काल्पनिक बातों को जोड़ कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ... उम्मीद है आप लोगों को मेरा ये प्रयास भी पसंद आयेगा.

आज से कई साल पहले कि बात है, रायबरेली से कुछ किलोमीटर दूर स्थित अमेठी गाँव में में एक ऐसी ही लड़की थी... उसकी उम्र होगी करीब १६-१७ साल. सबकी चहेती घर में सब कि लाडली किसी का दुःख उससे देखा न जाता... दादी के घुटने में दर्द हो तो तेल लेकर लगाने बैठ जाती. दादी कितना समझतीं की लड़कियां पर नहीं छूतीं इसपर वो तपाक से बोलती '' दादी मैं पैर छु नहीं रही हूँ आपको दर्द हो रहा है इसलिए दबा रही हूँ...''
''हाय भगवान् इस लड़की से कोई जीत नहीं सकता...''  

ऐसी ही थी मुस्कान...खुद खुश रहती ओर दूसरों को भी खुश रखती. पढ़ती तो बारहवी कक्षा में लेकिन दिल पांच साल के बच्चों जैसा था. पल में रूठ जाना पल में खुश हो जाना. बस एक ही समस्या थी उसके साथ. कभी किसी को अपनी तकलीफ के बारे में नहीं बताती थी... जिसका खामियाजा उसे और उसके सभी जानने वालों को भुगतना पड़ा... खैर ये बाद कि बात है.. अभी तो हम बात कर रहे हैं मुस्कान की मुस्कराहट की... उसका एक बड़ा भाई भी था क्षितिज... था तो उससे तीन साल बड़ा पर मुस्कान के लिए वो उसका भाई कम दोस्त ज्यादा था. स्नातक करने के बाद उसकी नौकरी एक एमएनसी कंपनी में लग गई थी सो उससे दिल्ली जाना पड़ रहा था. परिवार में सभी खुश थे. मम्मी, पापा, दादी, बस मुस्कान की मुस्कान कहीं गायब हो गई थी... एक भैया ही तो था जिससे वो लड़ भी लेती थी ओर झगड़ भी..
''हे छोटी तुझे ख़ुशी नहीं हुई क्या मेरी नौकरी लगने की''
''नहीं ऐसी बात नहीं है मैं तो सोच रही थी कि मैं अब मैं आपके friends के secret किसी बताउंगी ??''  
क्षितिज बहुत जोर से हंसा उसकी बात पर..
''अरे पगली इत्ती सी बात और तू मूह फुलाए बैठी है... तू मुझसे फ़ोन पर बात कर लिया करना''
''वो तो मैं कर ही लुंगी लेकिन आप बीजी हुए तो?''
''तब तू मुझे मुझे ,मैसेज कर दिया करना...वैसे भी दिनभर दोस्तों के मैसेज सुन सुन के मैं पक जाता हूँ ''
जोर से ''भैया...'' बोल कर मुस्कान ने क्षितिज के बाल खींच लिए...
क्षितिज ने मुस्कान के माथे को चूमा ओर अपने कमरे में चला गया
अगले दिन उसकी दिल्ली के लिए रवानगी थी सो वह जल्दी सो गया
सुबह उसकी आंख मुस्कान के फिर से बाल खीचने के बाद खुली...
''अरे! तू इतनी जल्दी कैसे उठ गई??''
''आप जा रहे हैं न ...मैने सोचा आपको आखरी बार चाए तो पिला दूं...''
''बोल तो ऐसे रही है कि अब मैं वापस आऊंगा ही नहीं.... ''
''अरे मेरा मतलब था कि अब पता नहीं आप कब आयें इसलिए सोचा की आपको चाए मैं ही बना कर पिला दूँ.. मम्मी ने आपके लिए खूब सारा सामान बनाया है...मीठी पूड़ी, ठेकुआ, मिर्ची का अचार, बसन के लड्डू...''
''अरे अब बस कर पूरा मेनू यहीं बता देगी क्या.. ला चाए दे..तू चल मैं नहा के आता हूं''  


         To be continued....





                                                                                                     NEXT PART OF THE STORY... 


उसके बाद क्षितिज चला गया नहाने और मुस्कान नीचे किचन में आ गई, मम्मी ठेकुआ बना कर रख रहीं थीं. वो पीछे ही खड़ी होकर बोली 
''मैं और कुछ करूँ?''
''अब क्या करेगी तू? सब तो मैने ही कर दिया....अच्छा एक काम कर मर्तबान से मिर्ची का आचार निकाल ला. उसे बहुत पसंद है न..''
मुस्कान दौड़ कर स्टोर रूम में गई और अचार निकाल लाई...
''अरे!! इतना सारा अचार क्यूँ निकाल लाई? ''
''आप ही ने तो कहा था कि भैया को अचार बहुत पसंद है...इसलिए निकाल लाई''
''अरे लड़की...अच्छा चल अब फटाफट तैयार हो जा भैया को छोड़ने नहीं जाएगी क्या ?''
''नही...मैं उनको जाते हुए देख नहीं पाऊँगी...'' यह कहकर मुस्कान उदास हो गई
तब तक क्षितिज नीचे आ चुका था
''क्या हुआ छोटी? ऐसे मुंह बना के क्यूँ खड़ी है?''
''कुछ नहीं आप जा रहे हो न...अच्छा नहीं लग रहा है...''
''अच्छा ठीक है फिर मैं नहीं जाता हूँ ''
''नहीं आप जाइये...मैं उदास नहीं होउंगी..''
''पक्का??''
मुस्कान ने जोर से क्षितिज को कंधे पे मारा और कहा ''एकदम पक्का''
''अच्छा चल अब जल्दी से मुझे नाश्ता करा दे वर्ना देर हो जाएगी''
नाश्ता करने के बाद क्षितिज ट्रेन पकडने के लिए रवाना हो गया.
इधर मुस्कान थोड़ी देर उदास रही फिर कॉलेज जाने के लिए तैयार होने लगी.

''अरे मुस्कान....''
''जी दादी....अभी आई''
''बेटा कॉलेज से लौटते समय मेरी आंख में डालने वाली दवाई लेती आना.''
''ठीक है दादी लेती आउंगी और कुछ तो नहीं चाहिए??''
''वैसे मेरी सुपारी भी ख़तम हो रही है थोड़ी सी लेते आना...''
''दादी आपके दांत तो हैं नहीं, फिर आप सुपारी खाती कैसे हैं??''
''खाती थोड़ी न हूँ....उसकी डली को सरौते से काट के उसको मुंह में रखकर चूसती रहती हूँ...''
''उससे क्या होगा? ''
''मुझे अच्छा लगता है... टाइमपास हो जाता है.. ''
''दादी टाइमपास ही करना है तो कार्टून नेटवर्क देखा करिए...मैं आपकी सुपारी नहीं लाऊंगी.. जा रही हूँ बाय''
''देखो कितनी नालायक है खुद ही पुछा कुछ और तो नहीं चाहिए और अब कह रही है नहीं लाऊंगी''
मुस्कान गेट कि तरफ जाते हुए बोली ''आपको टाइमपास करना है न.. आपके लिए पोपिंस या लोलिपॉप ले आउंगी दिन भर खाइएगा''
और मुस्कान हंसते हुए चली गई
''ओये मोटी आज हिस्ट्री के नोट्स लेकर आई?'' मुस्कान ने सना से पुछा
''ओह नो यार, अब तो मैडम एक्स शर्तिया क्लास से बाहर कर देंगी. दो दिन से उनको गोला दे रही हूँ आज नहीं बच पाऊँगी. लेकिन क्या करूँ यार एक बार में इतना सारा लिखवा देती हैं उसे करने में टाइम तो लगता ही है न''
''पर मैडम, शायद आप ही की कक्षा में हम भी पढते हैं और हमारे नोट्स पूरे बने हुए हैं...''
''आप महान हैं देवी जी आपको शत शत नमन...मेरे को अपने नोट्स दे दे न..''
'पागल है क्या.. मैं क्या दिखाउंगी...ऐसा कर जितना काम नहीं हुआ है उसकी फोटोकॉपी करवा ले.. ''
''हाँ यार गुड आइडिया...बोल दूंगी कॉपी खो गई..सही है यार तू सच्ची में बेस्ट है...''


ये तो हुई क्लास की बात लंच के समय मुस्कान और उसका पूरा गैंग असेंबली ग्राउंड में इकठ्ठा हो कर सारे टीचर्स की नक़ल उतारते थे ....
''ओये आज प्रिंसी की नक़ल उतारते हैं...??''
''छोड़ो यार टकले कि नक़ल क्या उतरना...सो बोरिंग''
''कोई नहीं यार आज एक दूसरे की ही नक़ल उतारते हैं '' रक्षित बोला
''ठीक है शुरुआत तुम ही करो...'' सना ने कहा
''ठीक है मैं ............ मैं मुस्कान की नक़ल उतारूंगा..''
''मेरी क्यूँ... मैने ही तो कांसेप्ट दिया मुझे ही टीज़ करोगे..''
''कम ऑन यार गेम ही तो है...''
''तो ठीक है फिर मैं भी रक्षित की नक़ल उतारूंगी''
''ठीक है यार अब गेम शुरू करो नहीं तो बेल बज जाएगी''
''लेकिन पहले मैं करुँगी'' मुस्कान ने फरमान जारी कर दिया
ग्राउंड के stage के पास सब गोला बना कर खडे हो गए और मुस्कान बीच में  आई...
इससे पहले कि वो कुछ कर पाती उसे जोर से चक्कर आया और वो वहीँ पर गिर पड़ी
''अरे मुस्कान क्या हुआ''
''जल्दी दे पानी लाओ... क्या हुआ मुस्कान...मुस्कान ऑंखें खोलो'' रक्षित बहुत घबरा गया
''देखा सबको डरा दिया न....'' मुस्कान ने धीरे से आंख खोल कर कहा
''तू पागल है क्या...मेरी तो जान ही निकाल गई थी..'' रक्षित गुस्से से बोला
''देखी मेरी एक्टिंग बढियां थी न.....'
''क्यूँ यार तुने ऐसे क्यूँ किया हमारी तो जान ही निकाल गई थी... तुझे कुछ हो जाता तो?'' सना गुस्से में बोली..
''चिल यार मैं ठीक हूँ...मुझे एक्टिंग मों अवार्ड जरूर मिलना चाहिए'' मुस्कान खिलखिला कर हंसते हुए बोली
'''अच्छा बाबा सॉरी अब कभी ऐसे नहीं करुँगी... मैं सही बताऊँ... मुझे सच में चक्कर आ गया था''
''चल चल अब jayada पका मत इस बार हम बेवकूफ नहीं बनने वाले'' रक्षित वहां से जाने लगा
'आज घर पे तुम्हारी शिकायत करूँगा'
'अच्छा सॉरी प्लीज़ मम्मी को मत बताना नहीं तो बहुत डांट पड़ेगी'
तब तक बेल बज गई और सब क्लास में चले गए. क्लास में भी मुस्कान को सिर में दर्द बना रहा लेकिन उसने किसी से कुछ कहा नहीं.

घर पहुंची तो भी थोड़ी थकी हुई लग रही थी
'क्या हुआ मुस्की... किसी से झगडा हुआ क्या?'
'नहीं माँ सिर में दर्द है?'
'क्या हुआ... टिफिन खाया था कि नहीं? '
'हाँ खाया था....'
'अच्छा चल मुंह हाँथ धो ले मैं दवाई दे देती हूँ'
दवा खाने के बाद मुस्कान को नींद आ गयी. वो जब उठी तो शाम के सात बज चुके थे...
उठते ही भैया का ख्याल आया दौड़ के गई और भैया को फ़ोन लगाने लगी..
'हेल्लो भैया...'
'हे लिल प्रिन्सेज़..कैसी है तू?'
'आप पहुँच गए दिल्ली?'
'अभी नही बेबी.. रात को पहुंचुंगा. तू बता क्या रहा आज स्कूल में?'
'एक दम बढियां मैने अपनी एक्टिंग से सबको डरा दिया.. रक्षित मुझ से नाराज हो गया है'
'चल कोई बात नहीं मान जायेगा, वो घर आया था या नहीं?'
'नहीं आया, मुझसे गुस्सा हो गया है न इसलिए...माँ से बात कराऊँ?'
'माँ भैया से बात कर लो... '
फ़ोन माँ को थमा कर वो कमरे में चली गई. बोर्ड की परीक्षा में अभी कई महीने बाकी थे लेकिन वो अभी से तैयारी कर रही थी. पढाई के बाद अपनी डायरी लिखती और फिर खाना खा के सो जाती. अगले दिन से फिर वही दिनचर्या. इसी तरह समय बीतता गया. चार महीने के बाद एक दिन स्कूल में फिर से उसे चक्कर आया.
'क्या हुआ मुस्कान तू ठीक तो है न?' रक्षित ने पुछा
'हाँ कुछ नहीं थोड़ा चक्कर आ गया..'
'पानी दूँ?'
'नहीं मैं ठीक हूँ...तुम चिंता मत करो'
'अरे ऐसे कैसे चिंता नहीं करूँ.. यु आर माई बेस्ट फ्रेंड. आज मैं तुम्हे घर छोड़ देता हूँ..ठीक है'
'ठीक है..मम्मी भी तुम्हे पूछ रही थीं'
'नमस्ते आंटी!'
'नमस्ते बेटा! अंदर आओ कैसे हो बडे दिनों के बाद आना हुआ'
'हाँ आंटी एग्जाम आने वाले हैं तो बिज़ी रहता हूँ...आंटी मुस्कान की  तबियत ठीक क्यूँ नहीं रहती?'
'पता नहीं बेटा अक्सर सिर दर्द कि शिकायत करती है सोच रही हूँ इसकी ऑंखें टेस्ट करवा दूँ'
'इसने आपको बतया है या नहीं..इसको अक्सर चक्कर भी आ जाता है...'
'नहीं तो सिर दर्द के बारे में ही बताती है हमेशा..मुस्की ओ मुस्की..'
'हाँ माँ? क्या हुआ अभी आती हूँ, चाए बना रही हूँ'
'तुने कभी बताया क्यूँ नहीं कि तुझे चक्कर भी आते हैं...'
मुस्कान ने गुस्से से रक्षित को देखा और इशारा किया तुमने क्यूँ बताया??
'उसे क्या धमका रही है.. मुझसे बात कर..भैया को बताया था?? उससे तो तेरी घंटों बात होती है..'
'मैने सोचा आप लोग बेवजह परेशान हो जायेगे इसलिए नहीं बताया'
'वाह रे लड़की दुनिया भर की बातें करती है लेकिन अपनी तकलीफ कभी नहीं बताती.. कल ही तुझे डॉक्टर के पास ले के जाती हूँ'
'माँ मुझे कुछ भी नहीं हुआ ये रक्षित तो ऐसे कहता रहता है..मैं बिलकुल ठीक हूँ'
'नहीं आंटी सच में इसको कई बार चक्कर आ चुका है..इसने एक बार एक्टिंग कर के हम लोगों को डरा भी दिया था'
'तुम चुप रहो माँ मुझसे बात कर रही हैं..'
'आंटी मैं चलता हूँ इसका पारा अभी बहुत गरम है कहीं फट गई तो परेशानी हो जाएगी...अरे अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई है...'
ये सुनना था की मुस्कान को जोर से हंसी आ गई
'अच्छा आंटी चलता हूँ.. और तू तुझे कल स्कूल आने कि जरूरत नहीं..chekup करा ले..ठीक हो जा फिर आना समझी मैं रोज रोज घर छोड़ने नहीं आऊंगा..'
'ठीक ठीक है अब तुम जाओ मुझे शिक्षा देने कि जरूरत नहीं'
क्षितिज को जैसे ही ये बात पता चली उसने तुरन मुस्कान से बात की
'ए हिरोइन..तू बहुत बड़ी हो गई है क्या? तुने बताया क्यूँ नहीं तेरी तबियत ठीक नहीं है..'
'क्या भैया अब आप भी शुरू हो गए... जा तो रही हूँ कल डॉक्टर के पास..घबराइए नहीं इतनी जल्दी मरने नहीं वाली.. आप घर कब आ रहे हैं अब तो छे महीने हो गए आपको देखे हुए'
'आऊंगा यार अभी छुट्टी नहीं मिल पा रही है हो सकता है दो हफ्ते बाद आने का मौका मिल जाये..'
'जल्दी आइयेगा मैने आपके लिए एक अच्छी सी शर्ट खरीद कर रखी है'
'अच्छा बाबा अब तू सोजा रात बहुत हो गई है..ठीक है?'
'नहीं अभी नहीं..'
'क्यूँ ?'
'अभी डायरी लिखनी है न'
'ओह मैं तो भूल ही गया था. चल ठीक है लेकिन जल्दी सो जाना कल डॉक्टर से भी तो मिलना है. ओके बाय'

अगले दिन सुबह उठते ही मुस्कान को उल्टियाँ होने लगीं. माँ और रक्षित उसे डॉक्टर के पास ले गए. पूरा चेकअप करने के बाद डॉक्टर गंभीर स्वर में बोले
'इसको कितने दिनों से चक्कर आ रहा था?'
'पता नहीं डॉक्टर साहब... लेकिन अक्सर सिर दर्द बताती थी.'
कुछ देर शांत रहने के बाद डॉक्टर ने पुछा 'बच्ची के पिता कहाँ हैं?'
'अंकल की कार एक्सिडेंट में कई साल पहले ही मौत हो चुकी है, घर में सिर्फ दादी और आंटी ही रहते हैं भैया दिल्ली में जॉब कर रहे हैं. में उसका दोस्त हूँ.कोई दिक्काल हो तो आप मुझे भी बता सकते हैं'
'बच्ची ने आप लोगों से चक्कर के बारे में न बता कर गलती कर दी हो सकता है इसे सिर दर्द के बाद उल्टियाँ भी होती हों जिसने इसे कभी बताया नहीं..'
'बात क्या है डॉक्टर? मुस्कान ठीक तो हो जाएगी न?' रक्षित ने पुछा
'कुछ कह नहीं सकते.. बहुत देर हो चुकी है...आप बच्ची के बडे भाई को बुलवा लीजिये'
'प्लीज़ डॉक्टर साफ साफ बताइए कि क्या हुआ हैं मुस्कान को' मुस्कान की मम्मी ने पुछा
'उसे ब्रेन कैंसर है.. लास्ट stage .. सॉरी..'
ये सुनना था कि दोनों लोगों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई..
जैसे ही क्षितिज को पता चला वो छुट्टी लेकर वापस आ गया. घर में दादी का रो रो के बुरा हाल था. मुस्कान की माँ को तो जैसे सांप सूंघ गया हो. उन्होने ऑफिस से छुट्टी कर ली. क्षितिज और रक्षित ने शहर के बडे से बडे डोक्टरों से संपर्क किया लेकिन कहीं कामयाबी नहीं मिली
शाम को मुस्कान के बेड के पास दोनों बैठे थे. उसे ड्रिप चढ़ रही थीं. क्षितिज ने जैसे ही उसके माथे पर हाँथ फेरा उसने आंख खोल दी और मुस्कुरा कर कहा
'बहुत देर कर दी आपने आने में.. मैं कब से आपका इन्तेजार कर रही थी'
आंख में आंसु लेकर क्षितिज बोला 'अब मैं आ गया हूँ न..जी भर के बात कर लेना..'
'अपने शर्ट देखी ? कैसी लगी? अपने उसे पहना क्यूँ नहीं?'
'अभी तो सबसे पहले तुझे ही देखने के लिया आया हूँ.. शाम को शर्ट देख लूँगा ओके'
'मुझे पता है आपको पसंद आयेगी..आपका पसंदीदा कलर है.. नीला..'
'मेरे लिए भी कुछ ली थी क्या?' रक्षित ने माहौल बदलने के लिहाज से उसे छेड़ा
'तुमको तो हमेशा मेरे से कुछ न कुछ चाहिए ही होता है..एग्जाम आ रहे है न तुम्हारे लिए एक पेन लिया है वो भी उसी के साथ है तुम ले लेना'
'थैंक्स यार तुम तो बहुत अच्छी हो' अपने आंसुओं को छिपाने कि कोशिश करते हुए रक्षित बोला.
'वो तो मैं हूँ..लेकिन अब मुझे नींद आ रही है. माँ कहाँ हैं?'
'माँ भी यहीं पर हैं'
'बोल बेटा मैं यहीं पर हूँ..'
'मुझे नींद आ रही है..आप प्लीज मेरा सिर दबा दो.'
माँ मुस्कान का सिर दबाने लगीं..मुस्कान को नींद तो आई लेकिन उसके बाद वो कभी नहीं उठी..
उसके जाने के बाद जैसे पूरा घर काटने को दौड़ता. क्षितिज ने दिल्ली छोड़ कर लखनऊ में काम करना शुरू कर दिया.. एक दिन मुस्कान की अलमारी में उसकी डायरी मिल गई..
डायरी के हर पन्ने पर उसके दिल्ली जाने के बाद के हर दिन का ब्यौरा था..उसकी दोस्तों से लड़ाई उसका बीमार पड़ना..दादी से की हुई बात.. सब के लिये हर बार खरीदा हुआ तोहफा..माँ के साथ बिताया हर पल सब कुछ उसने अपनी डायरी में लिख रखा था....अपनी इन्ही यादों kii निशानी को ही तो वो छोड़ गई थी जिसे पढ़कर सब हंस भी सकते थे और रो भी..उसे महसूस भी कर सकते थे और मिस भी...वो एक नन्हे फ़रिश्ते से काम नहीं थी जब तक रही खुश रही और सबको ख़ुशी देती रही.


Sunday, June 6, 2010

iss baar kewal photos hi upload kar rahi hun.....

 






                                                                                                                           


                                                                                                                                 










So, How r u feeling today??????????

Wednesday, May 26, 2010

क्या आज किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी आपने??

'' घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें किसी रोते  हुए बच्चे को हंसाया जाये'' निदा फाजली साहब की ये शायरी किसी को भी एक बार सोचने पर मजबूर कर सकती है. इस दौड़ भाग भरी ज़िन्दगी में किसी को दूसरों का हाल चाल लेने तक की तो फुर्सत है नहीं, आखिर कोई किसी की परवाह क्यूँ करे??
आज हर कोई एक दूसरे से आगे निकालने के चक्कर में मदद करना तो दूर उसकी मुश्किलें बढ़ाने में भी पीछे नहीं रहता. वहीँ कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए दूसरों कि ख़ुशी ही अपनी ख़ुशी है ओर दूसरे का गम उनका गम. आप लोगों को लग रहा होगा कि आज मैं कोई बहुत बड़ा लेक्चर देने के मूड में हूँ. लेकिन खुश हो जाइये मैं ऐसा कुछ भी नहीं करने वाली. आज मैं लोगों कि ख़ुशी के बारे में बात करने जा रही हूँ.
कहा जाता है मुस्कराहट एक ऐसी भाषा है जिसे संसार का हर व्यक्ति समझ सकता है. कितनी भी बड़ी परेशानी हो किसी भी छोटे बच्चे की  मुस्कराहट के आगे कुछ भी मायने नहीं रखता.उसकी खिखिलाती हंसी सुनकर सारी चिंता कुछ देर के लिए बहुत दूर चली जाती है.
ट्राफिक में गाड़ी फंसी हो, हर तरफ से  होर्न की आवाज़ आ रही हो, चिलपों मची हो तो टेंशन मत लीजिये. एक बार गाड़ी के शीशे में अपनी शकल देख लीजिये आपको खुद ही हंसी आ जाएगी. उसके बाद आपको जाम में फंसे होने कि चिंता भी नहीं सताएगी.
सबसे ज्यादा मजा तब आता है जब कोई आपको फ़ोन करे ओर पूछे कहाँ से बोल रहे हो? इट्स वैरी नेचुरल हर कोई मुह से ही बोलता है.... to be continued....


शेष भाग...
कोई कितना भी परेशान हो उससे एक बार परेशानी के बारे में पूछ के तो देखिये..भले ही वो व्यक्ति कुछ बताये या न बताये, कम से कम थोड़ी देर के लिए वो अच्छा महसूस करेगा. इसी तरह अगर किसी को बिना किसी बात के हँसाना हो तो उसे कहिये कि तुम मेरे पांच गिनने तक हंस दोगे फिर गिनती गिनना शुरू कर दीजिये ..सामने वाले को शर्तिया हंसी आ ही जाएगी.
कई बार आपको हंसते हुए देखकर भी दूसरों को भी हंसी आ जाती है इसलिए आप खुश रहिये ओर दूसरों को भी खुश रखने कि कोशिश करिए.
कुछ लोगों को देखकर टेंशन अपने आप ही दूर होने लगता है.. जैसे छोटे बच्चे, आपका बेस्ट फ्रेंड, कॉमेडी शो, कोई अच्छा सा गार्डेन खूब सारे फूलों वाला, गाँव के झूलों पर पींगे बढ़ाते बच्चे ओर महिलाएं, दादी माँ कि पोपली हंसी, और ... हाँ!! भाई को परेशान करने से अच्छा टेंशन बूस्टर तो कुछ हो ही नहीं सकता हा हा हा हा!!! इस ब्लॉग तो मेरा भाई पढ़ेगा तो.....
खैर आगे बढते हैं... बात हो रही थी खुश रहने और दूसरों को भी खुश रखने की.. कई बार थोड़ी बहुत शैतानी करने से भी सामने वाले को ख़ुशी मिलती है यहाँ पर मेरा मतलब बातों की शैतानी से है..
 कुछ ऐसा बोलिए कि लोग हंसने पर मजबूर हो जाएँ लेकिन इस बात का भी ख्याल रखिये कि सामने वाले के दिल को कोई ठेस न पहुंचे क्यूंकि कई बार लोग हंसने हंसाने के चक्कर में इस बात को भूल जाते हैं कि उनकी बात किसी को चोट भी पहुंचा सकती है.. इसलिए जो भी कहिये जैसे भी हंसाने की  कोशिश करिए इस बात का ध्यान जरूर रखिये..
आखीर में इतना ही कहूँगी

'' DO ALL THE GOOD YOU CAN, TO ALL THE PEOPLE YOU CAN, AT ALL THE PLACES YOU CAN, IN ALL THE WAYS YOU CAN''
(DO GOOD, FEEL GOOD)
तो क्या आज आप किसी को फील गुड करायेंगे ??? :)


Sunday, May 2, 2010

अब आपकी बारी है...

आज ऑफिस से घर लौटते वक़्त एक ऐसी तस्वीर आँखों के सामने आ गई कि कुछ देर के लिए मन सोचने पर मजबूर हो गया कि  क्या कभी इस दिशा में भी कोई काम किया जा सकता है?? हुआ यूँ कि मैं अपने ऑफिस से जागरण चौराहे की ओर जा रही थी. टाइमस ऑफ़ इंडिया के ऑफिस के पास एक पान वाले कि गुमटी है. मैने देखा कि वहां से ७ से ९ साल कि बच्चियों जिनके हांथ में कूड़ा बीनने के लिए बोरा पकड़ा था उनमें से सबसे बड़ी लड़की ने एक रूपये का पान मसाला लिया, पुडिया को फाड़ा ओर तीनों ने उसके तीन हिस्से लगाये ओर अपनी भाषा में बात करते गुए तीनों वहां पडे हुए ईंटों पर बैठ गईं ओर आपस में हंसी ठिठोली करतीं रहीं. मुझसे रहा नहीं गया मैं वहां पर खडे हो कर उन्हे काफी देर तक देखती रही. तीनो कि निश्छल हंसी ओर अजीब सी भाषा में बातचीत जैसे कोई नया सुर निकल रहा था. तीनों आपस में बात करने में इतनी मगन थीं कि इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि मैं उनकी गतिविधियों को देख रही हूँ. वह तीनो थोड़ी देर में चली गयीं लेकिन मैं यही सोचती  रही कि आखिर क्यूँ इन बच्चों को तम्बाकू खाने की लत लग जाती है. गरीबी ओर बेकारी में क्या सिर्फ कुछ रूपये में मिलने वाली पुडिया इनकी भूख को रोक देती है??? सुबह से शाम तक ये कूड़ा बीनते हैं उसे बचने के बाद जो पैसे मिलते हैं उससे खाना मिलता है. फिर भी ऐसी कौन सी बात है कि मन रुक ही नहीं पता  है. 
ये तो बात हुई इन बच्चों की पर बडे भी कुछ कम नहीं. कई दोस्तों को सिगरेट पीने के लिए मना किया. एक ने बड़ी मुश्किल से सिगरेट पीना छोड़ दिया लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जो चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे हैं... मेरा कहना है उस पदार्थ का सेवन करना ही क्यूँ जिसको मुंह में खाने के बाद दोबारा पीक के रूप में थूका जाता है. जब पता है कि इसे थूकना ही है फिर भी लोग पता नहीं क्यूँ इसे खाते हैं?? सिगरेट के काश लेने का क्या फायदा जब उसे धुंए के रूप में अंदर जाना है या बाहर उड़ जाना है?? ये खुद के लिए तो नुक्सान दायक है ही सामने वाले के लिए भी खराब होता है. टाक्सी हो या ऑटो या फिर कार और बस जो लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं उसकी पीक सडकों पर थूकते हैं. ऑफिस के बाथरूम हों या फिर दीवारों के कोने, ये भी उनसे अछूते नहीं रह जाते. सोचिये नवाबों के शहर में आकर घूमने वाले लोगों को ये कितना खराब लगता होगा कि इस शहर के लोग अपने ही शहर को साफ़ सुथरा नहीं रख सकते... अभी कुछ महीनों पहले ही ऑस्ट्रालिया के एक नागरिक से बात करने का मौका मिला जब उससे इस शहर के बारे में पुछा तो वह बोला यहीं पर लोग अच्छे हैं, बहुत जल्दी दोस्त बन जाते हैं दूसरों की मदद भी करते हैं यहाँ का खाना लाजवाब  है..  मैने उससे पुछा यहाँ की कोई एक चीज़ ऐसी चीज़ जो आपको पसंद नहीं आयी?? उसने कहा,''यहाँ की सड़कें साफ़ नहीं होतीं... कई बार लोग थूकते हैं जिसकी गन्दगी देखकर मन ख़राब हो जाता है! ''
बात तो सही है गन्दगी जो करता है उसे समझ नहीं आता कि उससे गलती हुई कहाँ?? खैर मेरा मानना है कि अगर हम चाहते हैं कि इस समस्या का समाधान हो तो हम सबको इस बारे में सोचना पड़ेगा. मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं लोगों को धुम्रपान न करने की सलाह देती रहूँ. जो लोग तम्बाकू का सेवन कर के सड़कों पर थूकते है उन्हे भी कई बार समझती हूँ भले ही उम्हे बुरा लगे.. आपसे भी इतना ही अनुरोध है कि अगर हो सके तो लोगों को धूम्रपान के नुक्सान बताइए. इसकी शुरुआत अपने किसी खास व्यक्ति से की जा सकती है. मैने तो एक व्यक्ति कि सिगरेट बंद करवा दी आगे भी कोशिश जारी है... अब आपकी बारी है...


Tuesday, April 6, 2010

कभी बोलती आँखों को देखा है...

आज धुप  कुछ ज्यादा ही तेज थी. सूर्य देवता के बहुत ज्यादा आशीर्वाद से बचने  के लिये मैने चेहरे पर स्टोल  और हांथों में  लम्बे दस्ताने पहने थे. टैक्सी के लिये इंतज़ार  कर रही थी की इतने में  एक टैक्सी मेरे सामने ही आकर  रुकी . मै उसमें  बैठ गई .सबसे कोने में एक बुजुर्ग  व्यक्ति बैठे था. मै बीच में थी और बगल में 'एक महिला बैठी थी! उनकी गोद में बैठी हुई एक नन्ही सी बच्ची जिसकी  उम्र  करीब 10 महीने की थी, उसने  मेरी तरफ ऐसे आश्चर्य  से देखा, मानो उसे  मै  किसी अलग ग्रह की प्राणी लगी. मेरी तरफ  देख कर वो हंसी और मेरा चेहरा देखने  लगी, ये अलग बात है की  उसे मेरा ढका हुआ चेहरा ही दिखाई दिखा. शायद  वो मेरे चेहरे को देखने के लिए बेताब हो रही थी. मैने समय काटने के लिए उससे बात करनी शुरू कर दी तो पता चला की वो बोल भी नहीं पाती. फिर भी उसने अपनी भाषा में मुझे बहुत कुछ बताने की कोशिश की! मैं उससे बात करती रही और वो अपनी गिन गिन भाषा में पता नहीं क्या बोलती रही! उसकी नीली रंग की छोटी सी टोपी जिसके अंदर  उसके  हल्के  से बाल उसकी  प्यारी  और मासूम आँखों पर बार बार आ रहे थे! जिसे  मैने  जब दस्ताने पहने  हांथों  से ठीक किया तो वह धीरे से हंसी!  उसके  आगे के चार दांत,  जो बहुत ही छोटे  छोटे से थे, दिखने  लगे! फिर वो बहुत देर तक मेरी आँखों में देखती  रही, क्यूंकि चेहरे का वही  भाग  खुला  था.  मैं पूरे रास्ते उससे बातें करते हुए आई! वह भी ऐसे देखती रही जैसे मेरी सारी बात समझ रही हो! फिर उसने मेरे हाँथ की एक ऊँगली को कस कर पकड़ लिया और तब तक पकडे रही जब तक की हम टाक्सी स्टैंड तक पहुँच नहीं गए! फिर मैने उससे अनुरोध किया  ... प्लीज़ बेबी अब तो मेरी ऊँगली  छोड़ दो ... मुझे  जाना है... वो बहुत जोर से खिलखिलाई, उसकी  हंसी बहुत प्यारी  थी .... बिलकुल  एन्जल की तरह  .... हाँ वो नन्ही परी ही तो थी  ... जिससे मैं आज  मिली थी ... जाते  जाते  उसने  मुझे  जोर  जोर  से हाँथ  हिला  कर  टाटा  किया  या आँखों ही आँखों में कहा... फिर मिलेंगे.